दिल्ली एसआईआर: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से तार्किक विसंगतियों के संबंध मे स्पष्टीकरण मांगा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस  याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें दिल्ली में मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (एसआईआर) के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने आज इस मामले पर सुनवाई की। उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया कि ‘संदिग्ध’ लिस्ट में शामिल वोटरों को भेजे गए एसआईआर नोटिस में पर्याप्त कारण या जानकारी नहीं थी।

‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ में वैसे मामले आते हैं जिसमें माता-पिता और बच्चे की उम्र का अंतर 15 साल से कम या 50 साल से ज्यादा हो, एक ही पिता के नाम पर 6 या उससे ज्यादा लोग दर्ज हों, भाई-बहन की उम्र में 9 महीने से कम का अंतर हो, पुरानी और नई लिस्ट में माता-पिता के नाम या स्पेलिंग में अंतर हो।

सुनवाई के दौरान, जस्टिस बागची ने कहा कि कुछ एसआईआर नोटिस बिना सोचे-समझे यांत्रिक रूप से जारी किए गए लगते हैं। उन्होंने कहा, “लगभग बिना सोचे-समझे नोटिस जारी किए जा रहे हैं। पूरी संभावना है कि ये मशीन से बने नोटिस हैं। इसलिए कृपया जांचें कि क्या नोटिस भेजने से पहले कुछ और फिल्टर लगाने की ज़रूरत है।”

सीजेआई कांत ने कहा कि इस बात को स्पष्ट करने की गुंजाइश है कि एसआईआर नोटिस में वोटरों के खिलाफ बताई गई तार्किक विसंगतियों’ के बारे में उनसे क्या जानकारी मांगी जा रही थी।

उन्होंने कहा, “उस तार्किक विसंगति’ के बारे में आपको स्पष्ट करना होगा। उदाहरण के लिए, मुझे नोटिस मिल सकता है। पदोन्नति के बाद मैं मई 2019 में दिल्ली आ गया था। उससे पहले, मैं चंडीगढ़ में वोट डालता था। आपका नोटिस मुझसे पूछ सकता है कि 2019 में मैं दिल्ली में वोट डाल रहा था या चंडीगढ़ में, या कहीं और। हो सकता है आपको पता न हो कि मैं चंडीगढ़ में था। आप कह सकते हैं ‘दिल्ली या कहीं और, स्पष्ट करें।’ इसलिए व्यक्ति को बताया जाना चाहिए कि उसे क्या स्पष्ट करना है।”

उन्होंने प्रभावित वोटरों के फ़ायदे के लिए बूथ लेवल ऑफ़िसर्स को उनसे ज़्यादा बातचीत करने के लिए संवेदनशील बनाने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया।

सीजेआई कांत ने सुझाव दिया, “हम अब यह सुझाव दे रहे हैं कि बीएलओ को बस उस व्यक्ति की मदद करनी चाहिए। उन्हें उनसे संपर्क करना चाहिए और बताना चाहिए कि, देखिए, आपका सर्टिफ़िकेट यहाँ है, या शायद 2002 की पुरानी वोटर लिस्ट में भी नाम का ज़िक्र है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि भारत का चुनाव आयोग उन आम सवालों की एक लिस्ट जारी कर सकता है जो वोटरों के मन में इस प्रक्रिया को लेकर हो सकते हैं।

सीजेआई कांत ने सुझाव दिया, “शायद 10 से 15 सवाल या आपत्तियाँ। आप उनके लिए एक स्टैंडर्ड जवाब तैयार कर सकते हैं और हम सभी को भेज सकते हैं। जैसे अक्सर पूछे जाने वाले सवाल। इसे अख़बारों में छापें, वेबसाइट पर डालें, अपनी म्युनिसिपैलिटी से कहें, अपने बीएलओ से कहें। और जहाँ भी मोबाइल नंबर हों (उन अधिकारियों के जिनसे और शक होने पर संपर्क किया जा सके), वहाँ भेजें। इतनी जानकारी भी काफ़ी होगी। इससे लोगों को बहुत मदद मिलेगी।”

इसके बाद कोर्ट ने दिल्ली एसआईआर से जुड़ी याचिका पर चुनाव आयोग से औपचारिक रूप से जवाब माँगने के लिए नोटिस जारी किया। कोर्ट ने आदेश दिया, “नोटिस जारी करें। जवाब में अब तक उठाए गए तुरंत कदमों का भी ज़िक्र हो। दो हफ़्ते बाद सुनवाई के लिए लिस्ट करें।”

कोर्ट ने आयोग की इस बात पर भी ध्यान दिया कि दिल्ली एसआईआर प्रक्रिया में पाई गई किसी भी कमी को ठीक करने के लिए अभी समय है, क्योंकि राजधानी में निकट भविष्य में कोई चुनाव नहीं होने वाला है।

कोर्ट के सामने पेश याचिका में ख़ास तौर पर दिल्ली में चल रहे एसआईआर के दौरान वोटरों को भेजे जा रहे “लॉजिकल विसंगति” वाले नोटिसों को लेकर चिंता जताई गई। ये नोटिस वोटर के पुराने रिकॉर्ड में पाई गई विसंगतियों की ओर इशारा करते हैं और अगर इनका कोई स्पष्टीकरण न दिया जाए, तो वोटर का नाम संशोधित वोटर लिस्ट से हटाया जा सकता है।

याचिका में कहा गया है कि जिन वोटरों को ऐसे नोटिस भेजे जा रहे हैं, उनकी जानकारी और जिन वोटरों के रिकॉर्ड में “लॉजिकल विसंगतियाँ” पाई गई हैं, उन्हें चिह्नित करने के लिए इस्तेमाल किए गए मानदंडों का खुलासा किया जाना चाहिए।

याचिका अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने दाखिल की है। इसमें आरोप है कि चुनाव आयोग और दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जिन वोटरों को नोटिस भेजे, उनके नाम और कारणों का पर्याप्त खुलासा नहीं किया। इसके साथ ही ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ की श्रेणी में डालने के मानदंड, परिभाषा और दिशानिर्देश भी नहीं बताए गए।

शुरुआत में याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि प्रक्रिया चौंकाने वाले तरीक़े से चल रही है। 33 लाख से ज़्यादा वोटरों को बेहद कमजोर आधार पर नोटिस भेजे गए हैं। प्रशांत भूषण से सहमति जताते हुए जस्टिस बागची ने कहा, ‘लगभग मशीनी तरीक़े से नोटिस जारी हो रहे हैं। संभावना है कि ये मशीन से जनरेटेड नोटिस हों…’। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चुनाव आयोग से कहा, “आपको ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ को थोड़ा और स्पष्ट करना होगा।

चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दमा शेषाद्री नायडू ने बताया कि काम का बोझ संभालने के लिए कर्मियों की संख्या बढ़ाई गई है। नोटिसों में कारण दिए गए हैं। इस बीच कोर्ट ने पूछा कि 30-33 लाख नोटिस भेजे गए हैं तो इतने बड़े काम के लिए कितने बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ लगाए गए हैं?

नायडू ने बताया कि क़रीब 14000 बीएलओ और 1200 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी तैनात किए गए हैं। 29 अक्टूबर की समय सीमा है। अगर प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हुई तो चुनाव आयोग समय बढ़ाने पर विचार कर सकता है। उन्होंने आश्वासन दिया कि ‘एक भी वोटर का नाम नहीं काटा जाएगा’।

नोटिस के जवाब देने में कई तरह की दिक्कतें आने की बात भी रखी गई। प्रशांत भूषण ने मिसाल दी कि कुछ नोटिस में लिखा है कि वोटर और उसके माता-पिता की उम्र में 15 साल से कम का अंतर है। उन्होंने सवाल किया कि वोटर इसे कैसे साबित करे, क्योंकि चुनाव आयोग के बताए 12 दस्तावेजों में माता-पिता की जानकारी नहीं होती। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति पहले ही एन्युमरेशन फॉर्म भर चुका है और उम्र व निवास का सबूत दे चुका है तो फिर और दस्तावेज क्यों मांगे जा रहे हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि दिल्ली में ऊंची इमारतें हैं। क्या बीएलओ हर घर जाएंगे? उन्होंने यह भी बताया कि कुछ नोटिस में सिर्फ इतना लिखा है कि अधिकारी से मिलें, लेकिन जगह का जिक्र नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश ने दिल्ली की स्थिति को खास बताया। उन्होंने कहा कि यहां बड़ी संख्या में मूल निवासी दिल्ली वाले हैं, लेकिन बहुत से लोग दूसरे शहरों से आकर रहते हैं। ऐसे में यह तय करना ज़रूरी है कि कोई दो जगह वोट न डाले।

जस्टिस बागची ने कहा कि दिल्ली का काम पश्चिम बंगाल से आसान है। मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि अधिकारियों को थोड़ी ओरिएंटेशन की ज़रूरत है ताकि वोटरों में विश्वास पैदा हो। 15-20 तरह के सवाल-आपत्तियां हो सकती हैं। उनके मानक जवाब तैयार कर सभी को भेजे जा सकते हैं। जहां मोबाइल नंबर हैं, वहाँ बता दिया जाए कि इतनी जानकारी काफी है।

कोर्ट ने बिहार और पश्चिम बंगाल के एसआईआर मामलों में दिए गए अंतरिम आदेशों का हवाला दिया। उनमें बाहर किए गए लोगों के नाम और कारण प्रकाशित करने का निर्देश था। दिल्ली में भी उन्हीं दिशा-निर्देशों का पालन करने को कहा गया। कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया और अधिकारियों से पहला स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा, जिसमें उठाए गए कदमों का जिक्र हो।

(जनचौक ब्यूरो)

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